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Dainik Jagran’s Ideology Same as RSS, Says Editor Sanjay Gupta


कठुआ मामले में खबर और तथ्य के बीच की दूरी

उल्लेखनीय है कि दैनिक जागरण की पत्रकारिता पर सवाल उठाने के लिए उसके पुराने उदाहरणों को देखना जरूरी है. इनमें सबसे गंभीर मामला 2018 का कठुआ बलात्कार और हत्याकांड का है.

जब जम्मू-कश्मीर के कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ यौन हिंसा और हत्या के मामले में 20 अप्रैल 2018 को दैनिक जागरण ने पहले पन्ने पर एक खबर प्रकाशित की थी. इसका शीर्षक था, “कठुआ मामले में बच्ची से दुष्कर्म नहीं हुआ.” खबर में पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देकर दावा किया गया था कि रिपोर्ट में बलात्कार का उल्लेख नहीं है.

यह महज किसी खबर के शीर्षक में हुई चूक का मामला नहीं था. एक संवेदनशील आपराधिक मामले में, जिसमें एक बच्ची की हत्या हुई थी, मेडिकल रिपोर्ट की सीमित व्याख्या के आधार पर यौन हिंसा से इनकार करने वाला निष्कर्ष प्रकाशित किया गया. जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में किसी निष्कर्ष का स्पष्ट उल्लेख न होना अपने आप में यौन हिंसा न होने का प्रमाण नहीं है.

और समेत अन्य समाचार संस्थानों ने इस रिपोर्ट की आलोचना की. जम्मू-कश्मीर किया था कि मेडिकल विशेषज्ञों की राय के आधार पर बच्ची के साथ यौन हिंसा की पुष्टि हुई थी.

बाद में दैनिक जागरण ने को अपनी वेबसाइट से दिया. उस समय जागरण डॉट कॉम के संपादक कमलेश रघुवंशी ने को बताया था कि खबर को अधिक जांच के लिए हटाया गया है. लेकिन सवाल यह था कि अगर तथ्यों की जांच बाकी थी, तो ऐसी खबर को कई प्रिंट संस्करणों के पहले पन्ने पर जगह कैसे मिल गई? इस बारे में आप हमारी भी पढ़ सकते हैं.

इस मामले की गंभीरता इसलिए भी अधिक थी क्योंकि कठुआ प्रकरण को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिशें हो रही थीं. ऐसे माहौल में किसी प्रमुख अखबार की जिम्मेदारी थी कि वह उपलब्ध तथ्यों को सावधानी से पेश करे, न कि अधूरी जानकारी के आधार पर ऐसा निष्कर्ष प्रकाशित करे जो यौन हिंसा के आरोपों को ही संदेह के घेरे में डाल दे.

पत्रकारिता में गलती हो सकती है. लेकिन गलती स्वीकार करने, सुधार प्रकाशित करने और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया भी उतनी ही जरूरी है. कठुआ मामले ने दैनिक जागरण की तथ्य-जांच और संपादकीय निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए थे.

2017 का एग्जिट पोल: चुनाव आयोग को दखल क्यों देना पड़ा?

इसके पहले दैनिक जागरण के राजनीतिक कवरेज से जुड़ा एक दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का है.

पहले चरण के मतदान के बाद अखबार की वेबसाइट पर एक एग्जिट पोल प्रकाशित हुआ था. इसमें भाजपा को बढ़त मिलने का अनुमान जताया गया था, जबकि बसपा को दूसरे और सपा-कांग्रेस गठबंधन को तीसरे स्थान पर दिखाया गया था.

उस समय ने इसे चुनाव के दौरान एग्जिट पोल प्रकाशित करने पर लागू प्रतिबंधों का उल्लंघन माना और उत्तर प्रदेश के 15 जिलों में प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए. आयोग ने जनप्रतिनिधित्व कानून के संबंधित प्रावधानों और भारतीय दंड संहिता की धारा 188 का हवाला दिया था.





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