‘न्यूज़रूम बंद करने की नौबत आ जाएगी': निजी डाटा नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में बोले डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स
“अगर पत्रकारों को ख़बर प्रकाशित करने से पहले इजाजत लेनी होगी तो ख़बर का क्या ही मतलब रह जाएगा? इससे तो न्यूज़रूम बंद करने की नौबत आ जाएगी… यह तो पूरी तरह से पूर्व-सेंसरशिप की व्यवस्था है.”
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) एक्ट को चुनौती देने वाले डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) की सुप्रीम कोर्ट में आज यही दलील थी. संगठन की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत के नेतृत्व वाली बेंच ने सुनवाई की. सुनवाई के दौरान संगठन की ओर से दलील दी गई कि कानून के कुछ प्रावधान पत्रकारिता और समाचार प्रकाशन की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं. डीएनपीए ने अदालत से संबंधित प्रावधानों पर नोटिस जारी करने के साथ अंतरिम रोक लगाने पर विचार करने का आग्रह किया.
गौरतलब है कि इससे पहले, बीते साल 15 नवंबर को जब डाटा प्रोटेक्शन बिल के नियम अधिसूचित किए गए थे तो डिजिपब न्यूज़ इंडिया फाउंडेशन ने इन पर चिंता जताई थी.
18 नवंबर 2025 को में संगठन ने कहा था कि पत्रकारिता को कानूनी छूट न देना और सरकार को व्यापक अधिकार देना सूचना के अधिकार (आरटीआई), प्रेस की स्वतंत्रता और खोजी पत्रकारिता को प्रभावित कर सकता है. डिजिपब ने यह भी कहा था कि एक्ट की धारा 44(3) ने आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(j) में बदलाव कर सार्वजनिक हित में सूचना हासिल करने की गुंजाइश सीमित कर दी है.
इसके अलावा एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी इस पर चिंता जताई थी. गिल्ड ने चेतावनी दी थी कि पत्रकारिता को स्पष्ट छूट नहीं मिलने पर समाचार जुटाने और प्रकाशित करने की प्रक्रिया को व्यक्तिगत डेटा का ऐसा इस्तेमाल माना जा सकता है, जिसके लिए संबंधित व्यक्ति की सहमति जरूरी होगी. इससे पत्रकारिता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है, नई जानकारियां जुटाने की प्रक्रिया बाधित हो सकती है और सत्ता-संस्थानों की जवाबदेही तय करने वाली पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है.
अब इस मामले को दो दर्जन के करीब पारंपरिक मीडिया संस्थान मिलकर सुप्रीम कोर्ट लेकर पहुंचे हैं. उन्होंने भी डीपीडीपी एक्ट के प्रावधानों को पत्रकारिता के लिए घातक बताया है.
कोर्ट ने संस्थानों की ओर से प्रतिनिधित्व कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने कहा कि अगर खबर प्रकाशित करने से पहले अनुमति लेनी पड़ेगी, तो न्यूज़रूम बंद हो जाएंगे. इससे प्रकाशन से पहले सेंसरशिप की व्यवस्था कायम होगी. किसी व्यक्ति के बारे में खबर करने के लिए उसी से अनुमति लेनी होगी! ऐसा कैसे हो सकता है? फिर खबर क्या रह जाएगी?
कोर्ट ने कहा- संतुलन जरूरी
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “आप ये कैसे सुनिश्चित करेंगे कि इसका (पत्रकारिता के नाम पर) दुरुपयोग नहीं होगा. क्योंकि ये मासूम नागरिकों और पत्रकारों के अधिकार का सवाल है.. इसीलिए दोनों के बीच एक संतुलन बनाना होगा.”
इसके जवाब में दीवान ने कहा, “अगर खबर में कुछ गलत होता है, तो हम (मीडिया संस्थान) उसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार हैं, लेकिन प्रकाशित होने से पहले ही खबर पर रोक नहीं लगाई जा सकती. वैसे भी, पारंपरिक मीडिया संस्थान पहले से ही विभिन्न कानूनों के दायरे में बंधे हैं.”
गौरतलब है कि डीएनपीएन एक 21 प्रमुख समाचार संगठनों के डिजिटल नेटवर्क का प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन है. इनमें द इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, इंडिया टुडे, टाइम्स ग्रुप, ज़ी, एनडीटीवी और नेटवर्क 18 जैसे मीडिया संस्थान शामिल हैं. मामले की अगली सुनवाई अब 17 नवंबर को होगी.

