'गंगा-जमुनी' फ़ैंटेसी, मिटती भाषाएं एवं सोशल मीडिया के दौर में यूनिवर्सिटीज़ और लोकतंत्र का भविष्य
प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद अपनी किताब ‘पोएट्री ऑफ़ बिलॉन्गिंग’ में लिखते हैं कि कैसे भारत के मुसलमानों ने ऐतिहासिक रूप से इस सरज़मीन से अपना जुड़ाव केवल किसी नक्शे या राज्य की राजनीतिक सीमाओं के ज़रिए नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति, शायरी और सांझी विरासत के ज़रिए महसूस किया. लेकिन आज के मीडिया और राजनीति के इस दौर में, जहां वफ़ादारी और देशभक्ति का इम्तिहान रोज़ प्राइमटाइम टीवी और सोशल मीडिया पर लिया जाता है, अपनेपन का वह ख़याल आख़िर कहां खो गया है?
न्यूज़लॉन्ड्री इंटरव्यूज के इस ख़ास एपिसोड में हमने प्रोफ़ेसर अली खान महमूदाबाद से बात की. प्रोफ़ेसर खान अशोका यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान विभाग के प्रमुख हैं, एक जाने-माने इतिहासकार, लेखक और समाजशास्त्र के गहरे जानकार हैं. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने वाले प्रोफेसर खान की रिसर्च दक्षिण एशिया में पहचान, नागरिकता और ऐतिहासिक यादों के ताने-बाने को बहुत गहराई से समझती है.
आज के भारत में जहां इतिहास को नए सिरे से लिखा जा रहा है, विश्वविद्यालयों में आज़ाद सोच और बहस की जगहें सिकुड़ रही हैं, और सोशल मीडिया पर ट्रॉलिंग के ज़रिए राजनीति की दिशा तय हो रही है, वहां एक अकादमिक और संजीदा आवाज़ की क्या जगह बचती है?
इस इंटरव्यू में प्रोफ़ेसर खान ने अवध की लखनवी तहज़ीब, गंगा-जमुनी संस्कृति की प्रचलित अवधारणाओं, भाषा (उर्दू और हिंदी) के अस्तित्व के संकट और डिजिटल दौर में बदलती इंसानी पहचान पर बेबाक विचार रखे.
अपनी पारिवारिक विरासत, महमूदाबाद की ऐतिहासिक रियासत और दुर्लभ पांडुलिपियों के संग्रह पर बात करते हुए प्रोफ़ेसर खान ने कहा कि पूंजीवाद के इस दौर में सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों का व्यावसायीकरण एक कड़वी सच्चाई बन चुका है, लेकिन इल्म सार्वजनिक संपत्ति होना चाहिए. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपनी पारिवारिक लाइब्रेरी में मौजूद दुर्लभ पांडुलिपियों और पुरानी किताबों को एक ओपन डिजिटल रीडिंग रूम में बदलने की कोशिश कर रहे हैं ताकि दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति उन्हें मुफ़्त में पढ़ सके. उनका मानना है कि सदियों पहले किसी लेखक द्वारा लिखे गए ज्ञान पर किसी एक व्यक्ति या परिवार का एकाधिकार या ताला नहीं होना चाहिए.
अवध की संस्कृति और भाईचारे पर बात करते हुए उन्होंने पारंपरिक ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की आधुनिक व्याख्या पर सवाल उठाया. प्रोफ़ेसर खान के अनुसार आजकल गंगा-जमुनी तहज़ीब को इस तरह पेश किया जाता है मानो उसमें धर्म का घोल था यानी हिंदू और मुसलमान अपने धर्मों से दूर होकर लिबरल बने और साथ रहने लगे. इसे उन्होंने एक पोस्ट-कोलोनियल सेक्युलर एलीट फ़ैंटेसी करार दिया. उनका कहना है कि असलियत यह थी कि लोग अपने-अपने धर्म और आस्था में बेहद मज़बूत रहकर भी एक-दूसरे की धार्मिक और सांस्कृतिक सीमाओं का सम्मान करते हुए साथ रहते थे. भारत में सामाजिक भाईचारा धर्म से दूर हटकर नहीं, बल्कि धर्म की गहरी जड़ों के भीतर से ही निकला था.
आज की पीढ़ी और सोशल मीडिया के असर पर बात करते हुए प्रोफ़ेसर खान ने कहा कि इस डिजिटल व्यवस्था ने इंसान की पहचान को बेहद नाज़ुक बना दिया है. वर्चुअल दुनिया में असीमित छूट मिलने के कारण लोग इंटरनेट पर ट्रॉलिंग जैसी चीज़ों में शामिल हो रहे हैं, जो वे अपने आम सामाजिक जीवन या पड़ोसियों के साथ कभी नहीं करते. जहां दुनिया के कई देश जैसे ऑस्ट्रेलिया और स्कैंडिनेवियन मुल्क 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर कड़े क़ानून ला रहे हैं, वहीं भारत में पूरी राजनीति ही इसी डिजिटल स्पेस पर टिकी हुई है.
देखिए विश्वविद्यालयों में फ्री स्पीच, क्षेत्रीय राजनीति के बदलते स्वरूप, मीडिया नैरेटिव्स और अवध की उस लखनवी तहज़ीब पर यह गहन बातचीत.

