जंतर-मंतर पर दिल्ली पुलिस की जोर आज़माइश: हिरासत में प्रदर्शनकारी, पत्रकारों से बदसलूकी के आरोप
शुक्रवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन को कवर कर रहे कम से कम दो पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस पर उन्हें जबरन हिरासत में लेने और उनके साथ बदसलूकी करने का आरोप लगाया.
एक पत्रकार ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उनका माइक छीनकर तोड़ दिया. वहीं, दूसरे ने कहा कि पुलिस उन्हें घसीटकर दूर तक ले गई और तस्वीरें डिलीट करने के लिए कहा.
मालूम हो कि नागरिक समाज के संगठनों और कार्यकर्ताओं ने इस प्रदर्शन का आयोजन किया था, जिसमें ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) भी शामिल हुआ.
यह प्रदर्शन चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (एसआईआर) को संभालने को लेकर उठे कई विवादों और 23 सितंबर को अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट में सामने आए खुलासों के बाद आयोजित किया गया.
इस बीच पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू करके प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया. प्रदर्शनकारियों में प्रोफेसर नंदिता के अलावा योगेंद्र यादव, दीपांकर भट्टाचार्य, प्रशांत भूषण, नेहा बोरा और अंजलि भारद्वाज आदि शामिल रहे.
प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के साथ ही पुलिस ने मीडिया को भी जंतर मंतर से हटाने की कोशिश की.
कवरेज कर रहे पत्रकार बने निशाना
द वायर के लिए रिपोर्टिंग करने पहुंचे पत्रकार इरफान ने बताया कि जब वह योगेंद्र यादव और दीपांकर भट्टाचार्य से बात करने की कोशिश कर रहे थे, तभी दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेने की कोशिश की. इरफान का कहना है कि पुलिस ने उनका माइक छीन लिया और उन्हें जबरदस्ती बस में डाल दिया.
इरफ़ान ने कहा, “चार-पांच पुलिसवाले थे. मुझे घसीटकर बस में डाल लिया. मैं चिल्लाता रहा ‘मेरा माइक , मेरा माइक’. मेरा माइक टूट गया. मुझे पुलिसकर्मियों के चेहरे याद नहीं हैं, लेकिन हो सकता है कि यह घटना किसी कैमरे में रिकॉर्ड हुई हो.”
इरफान के मुताबिक, इस दौरान उनकी सहयोगी और पत्रकार ज्योति ने उनका पहचान पत्र उठाकर उन्हें दिया.
इरफान ने बताया कि उनके अलावा योगेंद्र यादव, दीपांकर भट्टाचार्य और रऊफ, अर्घया, चिरांशु, अभिषेक, दिशा स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन, एसएफआई तथा आइसा से जुड़े कई प्रदर्शनकारियों को भी हिरासत में लेकर एक ही बस से ले जाया गया. बस ने इन सभी को जाफरपुर कलां पुलिस स्टेशन पर छोड़ा.
इसी तरह एक और पत्रकार वेदांत लाखेड़ा ने अपना अनुभव बताया. फ्रंटलाइन पत्रिका से जुड़े वेदांत ने कहा, “दिल्ली पुलिस का एक जवान मुझे धक्का दे रहा था और प्रदर्शन स्थल से दूर हटा रहा था. इस पुलिसकर्मी ने अपना नेम टैग नहीं लगाया हुआ था. मैंने उससे उसका नाम और बैज नंबर बताने को कहा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों के मुताबिक पूछे जाने पर पुलिसकर्मियों को यह जानकारी देनी होती है. जब उसने अपना नाम बताने से इनकार किया तो मैंने उसकी तस्वीर लेने की कोशिश की.”
उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बाद पुलिस अधिकारी ने उन्हें और प्रदर्शन में मौजूद अन्य लोगों को जबरन वहां से हटाया और घसीटते हुए संसद मार्ग की ओर ले गए.
उन्होंने कहा, “इसके बाद वह बेकाबू हो गया और हमें प्रदर्शन स्थल से जबरन हटाने लगा. वह और अन्य पुलिसकर्मी मुझे घसीटते हुए संसद मार्ग तक ले गए, जहां उन्होंने मुझसे मेरे द्वारा खींची गई तस्वीर डिलीट करने को कहा. मैंने इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्होंने मेरी तस्वीर खींची. तब तक कई स्वतंत्र पत्रकार मेरे आसपास जमा हो गए थे और दिल्ली पुलिस को मुझे छोड़ना पड़ा.”
इसी तरह द पैट्रियट की रिपोर्टर आतिका ने बताया, “जब वह दिल्ली पुलिस द्वारा कुछ लोगों को हिरासत में लेने की कोशिश को अपने कैमरे पर रिकॉर्ड कर रही थीं, तभी उनकी पुलिस के साथ धक्का-मुक्की हो गई, जिसमें आतिका के भी हाथ और पैरों में चोट लगी.”
आतिका का कहना है कि पुलिस उन स्वतंत्र पत्रकारों को भी हिरासत में लेने की कोशिश कर रही थी, जिनके पास कोई पहचान पत्र नहीं था. आतिका ने बताया कि इस बीच कई स्वतंत्र पत्रकार उनके आसपास जमा हो गए थे, जिसके बाद दिल्ली पुलिस को उन्हें छोड़ना पड़ा.
प्रदर्शनकारियों का हल्ला-बोल
प्रदर्शनकारियों ने ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी और इस्तीफे की मांग को लेकर नारे लगाए. जैसे-जैसे प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ी, दिल्ली पुलिस ने उन्हें वहां से हटाने की कोशिश की. जब भीड़ तुरंत नहीं हटी, तो पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों को धक्का देना और उन्हें घसीटकर बसों में बैठाना शुरू कर दिया.
हिरासत में लिए जाने से पहले आरटीआई एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज ने कहा, “यह लोगों के विरोध करने के अधिकार पर स्पष्ट हमला है. हम शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना चाहते थे. लोग ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर यहां जुटे थे. पुलिस ने किसी को भी यहां खड़े रहने की इजाजत नहीं दी. यह दिनदहाड़े लोकतंत्र की हत्या है.”
नेहा ने पुलिस के इस दावे पर भी सवाल उठाया कि प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं ली गई थी.
हिरासत में लिए जाने से पहले नेहा ने कहा, “दिल्ली पुलिस कह रही है कि हमारे पास प्रदर्शन की अनुमति नहीं है, इसलिए वे हमें हिरासत में लेंगे. आज हम पूछते हैं- वोटरों के नाम हटाने से पहले क्या उन्होंने हमसे अनुमति ली थी? जब उन्हें हमारे लोकतंत्र से समझौता करने से पहले किसी अनुमति की जरूरत नहीं है, तो हम अपने संविधान से अनुमति लेंगे.”
प्रदर्शन में मौजूद प्रोफेसर नंदिता नारायण ने एसआईआर की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के ईसीआईनेट प्लेटफॉर्म के जरिए मतदाता सूची के डेटा के केंद्रीकरण की आलोचना की.
नारायण ने कहा, “डेटा को नियंत्रित करने की कोशिश बेहद खतरनाक है. जिन ईआरओ की शक्तियां छीनी जा रही हैं, जैसा कि गोवा में देखने को मिला, उन्होंने कई ईमेल लिखे.”
उन्होंने कहा कि चुनाव का संचालन एक ऐसी स्वतंत्र संस्था द्वारा किया जाना चाहिए, जिसे “इस तरह नियंत्रित” न किया जाए.
वहीं, वोटर अधिकार मंच से जुड़ी अमृता ने कहा, “जब इस एसआईआर प्रक्रिया को लेकर शक और आशंकाएं थीं, तो अब सामने आई रिपोर्टों ने उन आशंकाओं को साबित कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने जब इस प्रक्रिया को मंजूरी दी थी, तो इसे उसी तरीके से चलाया जाना चाहिए था. लेकिन अब जो सामने आया है, वह गैरकानूनी और असंवैधानिक है.” उन्होंने आगे कहा कि पुलिस ने यहां लोगों को बुरी तरह हिरासत में लिया है.”
दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि प्रदर्शन के लिए कोई अनुमति नहीं मांगी गई थी. पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान किसी भी पत्रकार के साथ बदसलूकी किए जाने के आरोपों से इनकार किया.
वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं है. इसमें एक ऐसे भारत की तस्वीर है- जहां खेत हैं, नदियां हैं, हरियाली है और एक मातृभूमि का सपना है. लेकिन आज जब हम उसी भारत के बीच खड़े होकर देखते हैं, तो सवाल उठता है- क्या वह तस्वीर अब भी वैसी ही है? हमारा नया प्रोजेक्ट इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश है. हम उन जगहों तक जा रहे हैं, जिनका ज़िक्र ‘वंदे मातरम्’ में है, और देख रहे हैं कि वक्त के साथ वहां का भारत कितना बदला है. यह एक गीत को समझने से ज्यादा, उस देश को समझने की कोशिश है जिसे हम अपना घर कहते हैं.
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